लेखिका: शशि कुशवाहा
जब भी पितृसत्ता (Patriarchy) की चर्चा होती है, तो बहस अक्सर अपने मूल मुद्दे से भटक जाती है। कुछ ही मिनटों में सवाल उठने लगते हैं—"क्या हर पुरुष गलत है?" "क्या सारी गलती पुरुषों की है?" या "क्या पितृसत्ता की बात करना पुरुषों से नफ़रत करना है?" ऐसी प्रतिक्रियाएँ यह बताती हैं कि हम अभी भी पितृसत्ता को एक व्यक्ति या एक जेंडर से जोड़कर देखते हैं, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है।
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि पितृसत्ता किसी पुरुष का नाम नहीं है। यह एक सामाजिक व्यवस्था, एक सांस्कृतिक ढाँचा और एक मानसिकता है, जिसमें शक्ति, निर्णय लेने का अधिकार, नेतृत्व और सामाजिक नियंत्रण को मुख्य रूप से पुरुषों से जोड़कर देखा जाता है, जबकि महिलाओं से आज्ञाकारिता, त्याग, सहनशीलता और समझौते की अपेक्षा की जाती है। इस व्यवस्था का असर केवल कानूनों या संस्थाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह लोगों की भाषा, परंपराओं, रिश्तों, परवरिश और रोज़मर्रा के व्यवहार में भी दिखाई देता है।
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इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि हर पुरुष पितृसत्तात्मक होता है। दुनिया में ऐसे असंख्य पुरुष हैं जो बराबरी में विश्वास करते हैं, महिलाओं के अधिकारों का समर्थन करते हैं और अपने परिवार तथा समाज में समानता की संस्कृति बनाने की कोशिश करते हैं। उसी तरह यह भी सच है कि हर महिला बराबरी की समर्थक नहीं होती। कई बार महिलाएँ भी उसी सोच को आगे बढ़ाती हैं, जिसे उन्होंने बचपन से सही मानना सीख लिया होता है। जब कोई महिला अपनी बहू से कहती है, "हमने भी सहा है, तुम भी सहो", या किसी लड़की से कहती है, "पति परमेश्वर होता है", "लड़की होकर इतनी ज़ोर से मत बोलो", तब वह अनजाने में उसी व्यवस्था को मजबूत कर रही होती है जिसने कभी उसके अपने अधिकार भी सीमित किए थे। इसलिए समस्या किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस सोच की है जो पीढ़ी दर पीढ़ी समाज में चलती रहती है।
यही कारण है कि समाजशास्त्री पितृसत्ता को एक "सिस्टम" मानते हैं, न कि किसी एक व्यक्ति का व्यवहार। यह व्यवस्था लोगों को जन्म के साथ नहीं मिलती, बल्कि धीरे-धीरे सिखाई जाती है। कोई भी बच्चा पैदा होते ही यह नहीं जानता कि लड़का श्रेष्ठ है या लड़की कमतर। वह यह सब अपने आसपास के माहौल से सीखता है। घर में, स्कूल में, रिश्तेदारों के बीच, फिल्मों में, विज्ञापनों में और कई बार धार्मिक तथा सांस्कृतिक व्याख्याओं के माध्यम से उसके मन में धीरे-धीरे यह धारणा बैठाई जाती है कि लड़कों और लड़कियों की भूमिकाएँ अलग-अलग हैं।
इस सीख की शुरुआत बहुत छोटी-छोटी बातों से होती है। बेटे से कहा जाता है, "तू तो घर का वारिस है", जबकि बेटी से कहा जाता है, "तुझे तो एक दिन दूसरे घर जाना है।" बेटे की पढ़ाई को परिवार का निवेश माना जाता है, लेकिन बेटी की पढ़ाई को कई घरों में आज भी खर्च समझा जाता है। बेटे के देर से घर आने पर चिंता कम होती है, लेकिन बेटी के कुछ मिनट देर होने पर उसके चरित्र तक पर सवाल उठने लगते हैं। बेटे की गलती को "लड़के हैं, गलती हो जाती है" कहकर टाल दिया जाता है, जबकि बेटी से हमेशा आदर्श व्यवहार की उम्मीद की जाती है। इन छोटी-छोटी बातों को अक्सर सामान्य मान लिया जाता है, लेकिन यही सामान्य बातें आगे चलकर समाज की बड़ी असमानताओं की नींव बनती हैं।
कई लोग यह तर्क देते हैं कि ऐसा सब महिलाओं की सुरक्षा के लिए किया जाता है। निश्चित रूप से हर माता-पिता अपने बच्चों की सुरक्षा चाहते हैं और इसमें कोई बुराई नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब सुरक्षा का पूरा बोझ केवल लड़कियों की स्वतंत्रता पर डाल दिया जाता है, जबकि लड़कों को यह सिखाने पर उतना ज़ोर नहीं दिया जाता कि महिलाओं का सम्मान कैसे किया जाए, उनकी सहमति का महत्व क्या है और सार्वजनिक स्थान सभी के लिए समान रूप से सुरक्षित होने चाहिए। यदि किसी समस्या का समाधान केवल संभावित पीड़ित की आज़ादी सीमित करना बन जाए, तो यह समाधान नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता है।
इतिहास पर नज़र डालें तो यह समझना कठिन नहीं है कि यह सोच कैसे बनी। दुनिया के अधिकांश समाज लंबे समय तक पुरुष-प्रधान रहे हैं। राजनीतिक सत्ता, संपत्ति, युद्ध, धार्मिक संस्थाएँ और सामाजिक निर्णय मुख्य रूप से पुरुषों के हाथों में रहे। जिन लोगों के पास शक्ति होती है, अक्सर वही समाज के नियम और मानदंड भी तय करते हैं। इसलिए सदियों तक बने कई सामाजिक नियमों में महिलाओं की भूमिका सीमित रखी गई। इसका यह अर्थ नहीं कि इतिहास के हर पुरुष ने महिलाओं पर अत्याचार किया या हर महिला पूरी तरह असहाय थी। इतिहास हमेशा जटिल होता है। लेकिन यह भी सच है कि अधिकांश संस्थागत शक्ति पुरुषों के पास केंद्रित रही, जिसका प्रभाव सामाजिक सोच पर पड़ा।
हालाँकि इतिहास कोई स्थायी भाग्य नहीं होता। अगर मानव समाज गुलामी जैसी व्यवस्था को समाप्त कर सकता है, लोकतंत्र स्थापित कर सकता है और नस्ल तथा जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को चुनौती दे सकता है, तो पितृसत्ता जैसी व्यवस्था पर भी सवाल उठा सकता है। समाज समय के साथ बदलता है, लेकिन बदलाव अपने आप नहीं आता। उसके लिए लोगों को पहले यह स्वीकार करना पड़ता है कि समस्या वास्तव में मौजूद है। जब तक हम हर आलोचना को पुरुषों पर व्यक्तिगत हमला मानते रहेंगे, तब तक उस सामाजिक व्यवस्था पर गंभीर चर्चा ही नहीं हो पाएगी, जो असमानता को जन्म देती है।
यही कारण है कि पितृसत्ता पर बात करना पुरुषों के खिलाफ अभियान नहीं, बल्कि समानता के पक्ष में संवाद है। इसका उद्देश्य किसी एक जेंडर को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि उन मान्यताओं की पहचान करना है जो किसी भी व्यक्ति के अधिकारों को केवल उसके जेंडर के आधार पर सीमित करती हैं। समानता का अर्थ प्रतिस्पर्धा नहीं, साझेदारी है। एक ऐसा समाज, जहाँ महिलाओं और पुरुषों दोनों को अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर मिले, अंततः पूरे समाज को अधिक न्यायपूर्ण, सुरक्षित और विकसित बनाता है।
पितृसत्ता: परवरिश से लेकर भाषा तक
अगर हमारा समाज वास्तव में लड़का और लड़की को बराबर मानता है, तो सबसे पहला सवाल यही उठता है कि दोनों की परवरिश अलग-अलग क्यों होती है? एक ही घर में जन्म लेने वाले दो बच्चों के लिए बचपन से अलग-अलग नियम क्यों बनाए जाते हैं? बेटे से कहा जाता है कि बाहर जाओ, दुनिया देखो, अपने फैसले खुद लो और जीवन में बड़ा बनो। वहीं बेटी से कहा जाता है कि ज़्यादा बाहर मत निकलो, धीरे बोलो, ढंग से बैठो, ज़्यादा हँसो मत और हमेशा यह ध्यान रखो कि लोग क्या कहेंगे। धीरे-धीरे यह संदेश उसके मन में बैठ जाता है कि उसकी आज़ादी हमेशा किसी न किसी शर्त से बंधी हुई है।
यहाँ यह स्पष्ट करना भी ज़रूरी है कि सुरक्षा सिखाना गलत नहीं है। हर माता-पिता अपने बच्चों की सुरक्षा चाहते हैं और यह स्वाभाविक भी है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब सुरक्षा के नाम पर केवल लड़कियों की स्वतंत्रता सीमित कर दी जाती है, जबकि लड़कों को यह सिखाने पर पर्याप्त ज़ोर नहीं दिया जाता कि महिलाओं का सम्मान कैसे करना है, उनकी सहमति का क्या महत्व है और सार्वजनिक स्थान हर व्यक्ति के लिए समान रूप से सुरक्षित होने चाहिए। यदि किसी समस्या का समाधान केवल संभावित पीड़ित की स्वतंत्रता कम करना बन जाए, तो इसका अर्थ है कि हम समस्या की जड़ तक पहुँचने की बजाय उसके परिणामों से समझौता कर रहे हैं।
पितृसत्ता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह केवल महिलाओं को ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि पुरुषों को भी एक तय साँचे में ढालने की कोशिश करती है। बचपन से लड़कों से कहा जाता है कि "मर्द बनो", "मत रो", "कमज़ोरी मत दिखाओ" और "भावुक होना लड़कियों का काम है।" इन वाक्यों का असर केवल भाषा तक सीमित नहीं रहता। वे लड़कों को अपनी भावनाएँ दबाना सिखाते हैं। वे यह मानने लगते हैं कि मदद माँगना कमजोरी है और संवेदनशील होना मर्दानगी के खिलाफ है। यही कारण है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याओं पर पुरुष खुलकर बात नहीं कर पाते। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि पितृसत्ता महिलाओं को दबाती है और पुरुषों पर भी अवास्तविक अपेक्षाओं का बोझ डालती है।
अक्सर बराबरी के विरोध में एक और तर्क दिया जाता है कि पुरुष और महिलाओं के शरीर अलग-अलग होते हैं, इसलिए दोनों बराबर नहीं हो सकते। यह तर्क सुनने में तार्किक लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह जैविक अंतर और समान अधिकार जैसी दो बिल्कुल अलग अवधारणाओं को मिला देता है। यह सच है कि प्रकृति ने पुरुष और महिला के शरीर में कई जैविक अंतर दिए हैं। लेकिन क्या किसी व्यक्ति के अधिकार उसके शरीर से तय होने चाहिए? अगर ऐसा होता, तो शारीरिक रूप से कमजोर पुरुषों, बुज़ुर्गों या दिव्यांग लोगों के भी कम अधिकार होने चाहिए थे। लेकिन लोकतांत्रिक समाज ऐसा नहीं मानता। समानता का अर्थ यह नहीं है कि सभी लोग एक जैसे हों। समानता का अर्थ है कि सभी को समान सम्मान, समान अवसर और समान अधिकार मिलें। जैविक अंतर प्रकृति का हिस्सा हैं, जबकि समानता संविधान और मानवाधिकारों का सिद्धांत है। दोनों की तुलना करना उचित नहीं है।
पितृसत्ता केवल व्यवहार में ही नहीं, बल्कि हमारी भाषा में भी दिखाई देती है। हम रोज़ ऐसे वाक्य सुनते हैं—"मर्द बनो", "औरतों जैसी हरकत मत करो", "बीवी को कंट्रोल में रखना चाहिए" या "घर संभालना औरत का काम है।" पहली नज़र में ये बातें सामान्य या मज़ाक जैसी लग सकती हैं, लेकिन समाजशास्त्र हमें बताता है कि भाषा केवल विचार व्यक्त नहीं करती, बल्कि विचारों का निर्माण भी करती है। जब किसी समाज में लगातार यह कहा जाता है कि पुरुष ताकत का प्रतीक है और महिला कमज़ोरी का, तो धीरे-धीरे यही धारणा सामान्य सत्य जैसी लगने लगती है। इसलिए यदि समाज बदलना है, तो केवल कानून बदलना पर्याप्त नहीं होगा। हमें अपनी भाषा और अपने रोज़मर्रा के व्यवहार पर भी पुनर्विचार करना होगा।
परिवार को अक्सर प्रेम, सुरक्षा और अपनापन देने वाली संस्था माना जाता है और अधिकांश परिवार वास्तव में ऐसा करने की कोशिश भी करते हैं। लेकिन कई बार यही परिवार अनजाने में असमानता को भी आगे बढ़ाते हैं। उदाहरण के लिए, कई घरों में यह अपेक्षा की जाती है कि बहू सबसे पहले उठे, सबके लिए खाना बनाए, सबको खिलाए और सबसे अंत में खुद खाए। अगर वह नौकरी भी करती हो, तब भी घर की अधिकांश जिम्मेदारियाँ उसी के हिस्से आती हैं। जब वह थकान की शिकायत करती है, तो जवाब मिलता है—"हमने भी तो किया है।" यह वाक्य केवल एक अनुभव नहीं, बल्कि एक पीढ़ी द्वारा दूसरी पीढ़ी को सौंपा गया बोझ भी है। इस तरह कई महिलाएँ भी अनजाने में उसी व्यवस्था को आगे बढ़ाती रहती हैं, जिसने कभी उनके अपने जीवन को सीमित किया था।
यही कारण है कि पितृसत्ता को केवल पुरुषों और महिलाओं के संघर्ष के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह एक ऐसी सामाजिक संरचना है, जिसमें कई लोग बिना किसी बुरी मंशा के भी उसी व्यवस्था का हिस्सा बने रहते हैं। बदलाव तब शुरू होगा, जब लोग यह समझेंगे कि किसी परंपरा का सम्मान तभी तक उचित है, जब तक वह किसी व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और समान अधिकारों का सम्मान करती हो। जो परंपरा किसी इंसान को केवल उसके जेंडर के आधार पर कमतर मानती है, उस पर सवाल उठाना समाज-विरोध नहीं, बल्कि समाज को अधिक न्यायपूर्ण बनाने की दिशा में उठाया गया एक आवश्यक कदम है।
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Tags
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