(सबसे पहले मैं अपने बारे में स्पष्ट कर दू़ं कि मैं होलिका दहन नहीं मनाती, आज तक कभी होलिका दहन देखने भी नहीं गई, न ही मैं ईश्वर जैसी किसी आलौकिक शक्ति पर विश्वास करती. मैं तर्कशीलता को बढ़ावा देती हूं, इसके अलावा मैं लगातार महिला अधिकारों के लिए भी काम कर रही, पितृसत्ता की विरोधी हूं. आप कह सकते हैं मैं नास्तिक व फेमिनिस्ट हूं. अंधविश्वास की विरोधी हूं, पर अंधविश्वास को मिटाने के लिए दूसरे अंधविश्वास को खड़ा करने पर यकीन नहीं करती. मैं तर्कों और तथ्यों से जानकारी देना उचित समझती हूं. )
हर साल की तरह इस साल भी आज हमारे देश में एक बड़े समुदाय के लोगों द्वारा होलिका दहन मनाया जा रहा है. वहीं दूसरी तरफ कुछ नारीवादी और खास समुदाय के लोगों द्वारा इसका जमकर विरोध किया जा रहा है..
बिना सबूत व बिना तथ्य के होलिका दहन का विरोध-
हर साल होली का त्योहार आते ही सोशल मीडिया फेसबुक और वाट्सएप पर एक मैसेज बड़ी तेजी तैरने लगता है, जिसमें #होलिका_दहन व #होली न मनाने के लिए कहा जा रहा है और मनगढ़ंत कहानी बनाकर होलिका दहन को महिलाओं का अपमान और महिला विरोधी त्योहार साबित किया जा रहा है। विरोधियों के मुताबिक, प्रहलाद नशे का आदी था। उसने अपनी बुआ #होलिका का पहले बलात्कार किया फिर उसे जिंदा आग में जलवा दिया। ऐसी ही लंबी कहानी बनाकर खास समुदाय के तमाम लोग प्रसारित कर रहे हैं। मैं उनसे पूछती हूं क्या सबूत है उनके पास कि होलिका नाम की कोई महिला भी थी और उसके साथ गलत हुआ ..?
अब बात करते हैं काल्पनिक यानी पौराणिक कथा की..
रंगोत्सव होली की पूर्व संध्या में होलिका दहन किया जाता है। इसके पीछे एक प्राचीन कथा है कि असुर हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु से घोर शत्रुता रखता था। इसने अपनी शक्ति के घमंड में आकर स्वयं को ईश्वर कहना शुरू कर दिया और घोषणा कर दी कि राज्य में केवल उसी की पूजा की जाएगी। उसने अपने राज्य में यज्ञ और आहुति बंद करवा दी और भगवान के भक्तों को सताना शुरू कर दिया। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। पिता के लाख कहने के बावजूद प्रह्लाद विष्णु की भक्ति करता रहा। असुराधिपति हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को मारने की भी कई बार कोशिश की परंतु भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते रहे और उसका बाल भी बांका नहीं हुआ। असुर राजा की बहन होलिका को भगवान शंकर से ऐसी चादर मिली थी जिसे ओढ़ने पर अग्नि उसे जला नहीं सकती थी। होलिका उस चादर को ओढ़कर 5 वर्ष के प्रह्लाद को गोद में लेकर चिता पर बैठ गई। संयोग से वह चादर उड़कर प्रह्लाद के ऊपर आ गई, जिससे प्रह्लाद की जान बच गई और होलिका जल गई। होलिका दहन के दिन होली जलाकर होलिका नामक दुर्भावना का अंत और भगवान द्वारा भक्त की रक्षा का जश्न मनाया जाता है। ये कहानी बुराई पर अच्छाई की जीत का भी प्रतीक है। इससे लोगों के बीच यह संदेश भी जाता है कि महिला या पुरुष चाहे जो भी हो वो किसी मासूम, निर्दोष के साथ गलत करेगी/करेगा तो उसको कुदरत से सजा मिलनी तय है।
होलिका दहन महिला का अपमान कैसे ?
अब ये कहानी कितनी सच है या गलत.. इसका भी कोई प्रमाण नहीं। मेरे अनुसार, ये कहानी भी मनगढ़ंत ही है, लेकिन समझने वाली बात ये है कि इस प्राचीन कहानी में कहीं भी महिला का अपमान होता नहीं दिख रहा है न ही यह महिलाविरोधी है। कई लोगों का कहना है सदियों से औरत का शोषण होता आया है उसे पुरुषों से कमतर माना गया है.. सीता मां को अग्निपरीक्षा देनी पड़ी, पार्वती सती हो गई आदि । ठीक है ये सच है हम भी मानते हैं इनके साथ बहुत गलत हुआ और आज भी महिला वर्ग शोषित है। लेकिन होलिका की कहानी इन सब के विपरीत है ।
कथा के मुताबिक होलिका को मारने के लिए नहीं, प्रहलाद को मारने के लिए आग लगाई गई-
माना होलिका भी एक महिला थी लेकिन कथा के मुताबिक, उसका किसी ने शोषण नहीं किया न ही उसे अग्नि में बैठने के लिए मजबूर किया गया। होलिका स्वेच्छा से 5 वर्ष के मासूम प्रहलाद को जिंदा जलाने के लिए उसे गोद में लेकर बैठी थी ।
जलाया जाना और स्व-इच्छा से अपने Over confidence से एक बालक को मारने के प्रयास में अगर कोई महिला अपने अहंकार में अपने आपको स्वयं आग में झोंकने का प्रयास करती है, और उसमें वो असफल रही तो क्या यह उसका अपमान है? क्या यह महिलाओं का अपमान है? नहीं... इसका पुरुषसत्ता से कोई संबंध नहीं. पुरुषसत्तात्मक सोच को भी दोष नहीं दिया जा सकता।
बुद्दिजनों को समझने की जरूरत है महिला हो या पुरुष वे सबसे पहले इंसान है और अपराध तो कोई भी कर सकता है। हालांकि ये सच है कि अपराध करने वाली महिलाओं की संख्या अपराध करने वाले पुरुषों की तुलना में बहुत ही कम है।
होलिका ही नहीं, रावण दहन भी होता है-
अब कई लोगों का कहना है भारत में एक औरत के जलने पर जश्न मनाया जाता है तो उनको याद दिला दूं जश्न तो रावण दहन पर भी मनाया जाता है.. हालांकि मेरे मुताबिक़, हमें किसी के भी दहन पर जश्न नहीं मनाना चाहिए.
आखिर में यही कहना है आप लोग होली या होलिका मनाइये अथवा न मनाइये ये आपकी स्वतंत्रता है. लेकिन एक मनगढ़ंत कहानी के विरोध में दूसरी मनगढ़ंत कहानी मत खड़ी करिए. बिना किसी सबूत के, बिना तथ्य की कहानियों से आप लोगों को जागरूक नहीं, दिग्भ्रमित करने का कार्य करते हैं. लोगों को हकीकत से रूबरू कराएं, उन्हें आप बता सकते हैं होलिका की कहानी के कोई तथ्य नहीं, कोई सबूत नहीं. लेकिन विरोध में एक और मनगढ़ंत कहानी बताकर उन्हें मूर्ख बनाने का काम न करें..🙏
शशि कुशवाहा ✍
हमें किसी भी चीज का न तो अंधविरोधी होना चाहिये न ही अंधभक्त।



