बुधवार, 17 जुलाई 2019

..ये कैसी इज्जत है !



ये हमारे ही देश में होता है कि बेटी की हत्या करने से नहीं जाती इज्जत, बेटी को पेट में मार देने से भी नहीं जाती, लेकिन बेटी अपनी मर्जी से दूसरी जाति में शादी कर ले तो इज्जत चली जाती है. बाप बेटी के पीछे गुंडे भेज दे तो नहीं जाती इज्जत.
बेटी सरेआम बोल दे कि बाप ने मेरे पीछे गुंडे भेजे तो इज्जत चली जाती है. बाप-भाई बेटी को अपने ही घर के आंगन में गाड़कर उस पर तुलसी उगाएं तो नहीं जाती इज्जत, लड़की अपनी जिंदगी का एक फैसला खुद ले ले तो इज्जत चली जाती है. 

मां-बाप का खोजा पति मारे-कूटे, जला दे, सातवीं मंजिल से फेंक दे तो नहीं जाती इज्जत, लड़की अपनी मर्जी का लड़का खोज ले तो इज्जत चली जाती है. 
वाह रे मां-बाप की इज्जत ! 
अब बहुत हो गया आपकी इस झूठी इज्जत के नाम पर बेटियों की बलि देना . 
बंद करिए अपनी इस झूठी इज्जत के लिए बेटियों की खुशियों का गला घोंटना.
बंद करिए बेटियों को अपनी जागीर समझना.
बंद करिए बेटियों के कंधों पर इस नासमझ इज्जत का बोझ लादना.
बंद करिए बेटियों को परिवार की इज्जत का नाम देना. 








मंगलवार, 16 जुलाई 2019

बेटा-बेटी की परवरिश में भेदभाव करना बंद करें मां-बाप


हमारे समाज में अधिकतर घरों में ऐसे होती है लड़कियों की परवरिश--

व्यवहार- हमारे घरों में बेटे और बेटी को पालने का तरीका बहुत अलग है. बेटियों के साथ अलग व्यवहार होता है और बेटे के साथ अलग. बेटों पर कोई पाबंदी नहीं लेकिन सारे नियम और कायदे बेटियों को ही निभाने की हिदायत दी जाती है. घर में व्यवहार के चलते अगर बेटियां कुछ कहें तो माताएं भी उनके खिलाफ खड़ी हो जाती हैं. क्योंकि उन्होंने भी दबकर रहना ही सीखा है.

आत्मनिर्भरता- भाई की आंखें बहन की हर गतिविधि पर लगी रहती हैं, किससे फोन पर बात कर रही है. कॉलेज से आने में 10 मिनट देर क्यों हुई. छत पर क्यों टहल रही है वगैरह-वगैरह. बहन को सही और गलत का पाठ पढ़ाने वाले ये भाई वो होते हैं जिनकी नाक बहनें बचपन में पोंछा करती थीं. बहन कितनी ही बड़ी क्यों न हो लेकिन छोटे भाई भी बहन के रखवाले की तरह बड़ा किया जाता है.

स्वतंत्रता- क्या हमारे घरों की बेटियां स्वतंंत्र हैैं ? नहीं. ज्यादातर घरों में बेटियों को उनके जीवन से जुड़े फैसले ही लेने नहीं दिए जाते. बहुत से घरों में तो बेटियों को फोन तक इस्तेमाल करने नहीं दिया जाता. उनके मन मुताबिक शिक्षा भी नहीं दिलवाई जाती. कुछ अच्छा करना चाहें तो भी तमाम तरह के किंतु परंतु होते हैं. क्योंकि अकसर लोग ये कहा करते हैं कि ज्यादा पढ़ लिख जाने से भी बेटियां बिगड़ जाती हैं. इसलिए थोड़ा बहुत पढ़ाओ और बेटी के हाथ जल्दी पीले करके गंगा नहाओ.

अहमियत- पढ़ाई तो बहुत छोटी चीज है. बेटियों की राय भी कई घरों में कोई मायने नहीं रखती. भले ही बेटियां बेटों से ज्यादा समझदार और पढ़ी लिखी हों. घर के फैसले पुरुष ही करते आए हैं. सो उन्हें लगता है कि वो लोगों के जीवन के फैसले भी खुद ही लें. बहुत से घरों में बेटियां अपने पापा से बात करने में भी डरती हैं.
ये कड़वा सच है। हालांकि अब बहुत से मांं-बाप अपनी इस सोच को बदल रहे हैं, जिससे अपने आगे के खुशहाल जीवन के लिए उनके बच्चों को घर छोड़ने जैसा कदम नहीं उठाना पड़ता और वो खुशी से जिंदगी जी रहे हैं और मां-बाप को भी खुश रख रहे हैं।

बेटी को बेटी ही रहने दें घर की इज्जत का नाम न दें



जब कोई लड़की अपने घरवालों के खिलाफ जाकर अपनी मर्जी से अपने पसंद के लड़के से शादी कर लेती है तो सब उस बुरा बोलते हैं और कहते हैं उसने घर की इज्जत मिट्टी में मिला दी पर कोई भी ये जानने की कोशिश नहीं करता कि आखिर उसे ये कदम क्यों उठाना पड़ा। कोई भी लड़की इस तरह से भागकर शादी नहीं करना चाहती। न ही कभी चाहती कि, उसके परिवार का सिर झुके।

जब उसके लिए सारे रास्ते बंद हो जाते हैं आगे कैरियर भी नहीं बनाने दिया जाता और उसके साथ हर जगह भेदभाव किया जाता है, तभी मजबूरी में कोई ये कदम उठाता है। हालांकि जो कम उम्र की लड़कियां ये कदम उठाती हैं बिना सोचे समझे वो गलत है।

अगर घर वाले लड़की का साथ दें उसकी पसंद के लड़के और कानूनी फैसले को एक्सेप्ट कर लें तो कोई लड़की घर वालों के खिलाफ न जाए कभी।

ये समाज का कड़वा सच है पर हमारा कथित सभ्य समाज इसे कभी स्वीकार नहीं करना चाहता। जिस दिन समाज घर और पिता की इज्जत को लड़की के नाजुक कंधों पर लादना बंद कर देगा उस दिन से उनकी इज्जत कभी लुटेगी ही नहीं ।