मंगलवार, 16 जुलाई 2019

बेटा-बेटी की परवरिश में भेदभाव करना बंद करें मां-बाप


हमारे समाज में अधिकतर घरों में ऐसे होती है लड़कियों की परवरिश--

व्यवहार- हमारे घरों में बेटे और बेटी को पालने का तरीका बहुत अलग है. बेटियों के साथ अलग व्यवहार होता है और बेटे के साथ अलग. बेटों पर कोई पाबंदी नहीं लेकिन सारे नियम और कायदे बेटियों को ही निभाने की हिदायत दी जाती है. घर में व्यवहार के चलते अगर बेटियां कुछ कहें तो माताएं भी उनके खिलाफ खड़ी हो जाती हैं. क्योंकि उन्होंने भी दबकर रहना ही सीखा है.

आत्मनिर्भरता- भाई की आंखें बहन की हर गतिविधि पर लगी रहती हैं, किससे फोन पर बात कर रही है. कॉलेज से आने में 10 मिनट देर क्यों हुई. छत पर क्यों टहल रही है वगैरह-वगैरह. बहन को सही और गलत का पाठ पढ़ाने वाले ये भाई वो होते हैं जिनकी नाक बहनें बचपन में पोंछा करती थीं. बहन कितनी ही बड़ी क्यों न हो लेकिन छोटे भाई भी बहन के रखवाले की तरह बड़ा किया जाता है.

स्वतंत्रता- क्या हमारे घरों की बेटियां स्वतंंत्र हैैं ? नहीं. ज्यादातर घरों में बेटियों को उनके जीवन से जुड़े फैसले ही लेने नहीं दिए जाते. बहुत से घरों में तो बेटियों को फोन तक इस्तेमाल करने नहीं दिया जाता. उनके मन मुताबिक शिक्षा भी नहीं दिलवाई जाती. कुछ अच्छा करना चाहें तो भी तमाम तरह के किंतु परंतु होते हैं. क्योंकि अकसर लोग ये कहा करते हैं कि ज्यादा पढ़ लिख जाने से भी बेटियां बिगड़ जाती हैं. इसलिए थोड़ा बहुत पढ़ाओ और बेटी के हाथ जल्दी पीले करके गंगा नहाओ.

अहमियत- पढ़ाई तो बहुत छोटी चीज है. बेटियों की राय भी कई घरों में कोई मायने नहीं रखती. भले ही बेटियां बेटों से ज्यादा समझदार और पढ़ी लिखी हों. घर के फैसले पुरुष ही करते आए हैं. सो उन्हें लगता है कि वो लोगों के जीवन के फैसले भी खुद ही लें. बहुत से घरों में बेटियां अपने पापा से बात करने में भी डरती हैं.
ये कड़वा सच है। हालांकि अब बहुत से मांं-बाप अपनी इस सोच को बदल रहे हैं, जिससे अपने आगे के खुशहाल जीवन के लिए उनके बच्चों को घर छोड़ने जैसा कदम नहीं उठाना पड़ता और वो खुशी से जिंदगी जी रहे हैं और मां-बाप को भी खुश रख रहे हैं।

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